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मोबाइल नहीं, तो लाइफ नहीं??

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*दिल्ली प्रेस द्वारा प्रकाशित पत्रिका “सुमन सौरभ” के सितंबर २०१४ अंक में एक प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रकाशित व पुरस्कृत संक्षिप्त लेख*…
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सचमुच, आज मोबाइल ने लोगों की जीवनशैली को इस हद तक प्रभावित किया है कि यह लोगों की ज़िंदगी का महत्तवपूर्ण हिस्सा बन गया है!
शुरुआती दौर में मोबाइल का प्रयोग केवल बातचीत करने या संदेश भेजने हेतु किया जाता था, लेकिन जैसै-जैसे विज्ञान एवं तकनीक का विकास हुआ, इस छोटे से “जादुई यंत्र” में सारी दुनिया समाती चली गई!
जब से मोबाइल में इंटरनेट का प्रावधान जुड़ा है तब से इसके प्रयोगकर्ताओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होने लगी और तभी से इसकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई!
किंतु इन सबके बावजूद यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि मोबाइल के बिना लाइफ संभव नहीं! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब मोबाइल का प्रचलन नहीं था, तब भी लोग बेहतर ज़िंदगी जीते थे!
इस संदर्भ में मैं एक निजी अनुभव बांटना चाहूंगा! आज से कुछ साल पूर्व, जब सभी के पास मोबाइल नहीं हुआ करते थे, इनका मूल्य अधिक होने के साथ-साथ कॉल दर भी आज की अपेक्षा काफ़ी अधिक होती थी!
उस समय हमारे गांव में किसी के घर में मोबाइल नहीं था! तब मैंने बाहर कमाने गए बेटे की मां एवं उसकी पत्नी को इंतजार करते देखा था! गांव में डाकिए के आते ही सब का आशा भरी दृष्टि से उस कि तरफ़ देखना कि शायद वह मेरे नाम की चिट्ठी भी निकाल कर दे,मुझे आज भी याद है!
पत्र द्वारा लिफ़ाफे में प्रेषक के शब्दों के साथ-साथ उस की ख़ुशबू भी आ जाया करती थी! वह सब आज के मोबाइल युग में कहां संभव है? यहां तो सब को हर चीज़ की जल्दी है! सबकुछ एकदम बनावटी ढंग से होता है! झट से संदेश भेजा और पट से जवाब आ गया! कोई प्रतीक्षा नहीं, कोई आनंद नहीं!
सच तो यह है कि बिना मोबाइल के भी जीवन संभव है और वह भी आनंदपूर्वक! इस के अलावा मोबाइल ने शारीरिक व मानसिक व्याधियों को जन्म दिया है, इस का प्रयोग न कर हम इन रोगों से बच सकते हैं..!!

- जयनित कुमार मेहता
अररिया, बिहार

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